श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 190: युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  3.190.61 
आश्रयिष्यन्ति च नदी: पर्वतान् विषमाणि च।
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजा: कुरुकुलोद्वह॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र युधिष्ठिर! अत्याचारियों से भयभीत होकर ब्राह्मण इधर-उधर भागकर नदियों, पर्वतों और दुर्गम स्थानों में शरण लेंगे। 61.
 
Yudhishthira, the son of the Kuru clan! The Brahmins, frightened by the tyrants, will flee here and there and take refuge in rivers, mountains and inaccessible places. 61.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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