श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 190: युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.190.5 
कां च काष्ठां समासाद्य पुन: सम्पत्स्यते कृतम्।
विस्तरेण मुने ब्रूहि विचित्राणीह भाषसे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
कलियुग की किस सीमा तक पहुँचने पर पुनः सत्ययुग का प्रारम्भ होगा? हे मुनि! कृपया इन सब बातों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए; क्योंकि आपकी कथा बड़ी विचित्र है॥5॥
 
When Kaliyug reaches what limit will Satyayug begin again? O sage! Please describe all these things in detail; because your story is very strange.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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