श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 190: युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.190.35 
आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च।
भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
भारत! लोग इतने निर्दयी हो जाएँगे कि वे सज्जन पुरुषों पर भी बार-बार आक्रमण करेंगे, उनके धन और स्त्रियों को बलपूर्वक छीन लेंगे और उनके रोने-धोने पर भी दया नहीं करेंगे॥ 35॥
 
Bharat! People will become so ruthless that they will repeatedly attack even the noble men and will forcibly take away their wealth and women and will not show any mercy even when they cry and wail.॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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