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mahabharat 3.190.10: परन्तु त्रेतायुग में वह धर्म अधर्म के एक पाद से दबकर केवल तीन भागों में ही स्थित रहता है। द्वापरयुग में धर्म केवल आधा ही रह जाता है। शेष आधे भाग में अधर्म समा जाता है।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.190: युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 190: युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.190.10 
अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशै: प्रतिष्ठित:।
त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
परन्तु त्रेतायुग में वह धर्म अधर्म के एक पाद से दबकर केवल तीन भागों में ही स्थित रहता है। द्वापरयुग में धर्म केवल आधा ही रह जाता है। शेष आधे भाग में अधर्म समा जाता है।॥10॥
 
But in the Treta Yuga, that Dharma is overwhelmed by one foot of Adharma and is established only in its three parts. In the Dwapara Yuga, Dharma remains only half. Adharma gets mixed in the other half.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)