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श्लोक 3.190.1  |
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो मार्कण्डेयं महामुनिम्।
पुन: पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने पुनः महर्षि मार्कण्डेय से अपने राज्य में होने वाले संसार के भावी कार्यकलापों के विषय में इस प्रकार पूछा ॥1॥ |
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| Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Kuntinandan Yudhishthir again asked the great sage Markandeya about the future activity of the world in his empire in this manner. 1॥ |
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