श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.187.8 
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्या मत्स्यं विशेषत:।
आस्वदन्ति सदा वृत्तिर्विहिता न: सनातनी॥ ८॥
 
 
अनुवाद
‘बलवान मछलियाँ विशेष रूप से दुर्बल मछलियों को अपना आहार बनाती हैं, यह हमारी मत्स्य जाति का सदैव से निश्चित स्वभाव रहा है ॥8॥
 
‘Strong fishes especially make weak fishes their food, this has always been the fixed nature of our fish species. ॥ 8॥
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