श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.187.54 
तपसा चापि तीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति।
मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वे घोर तप से जगत् की रचना करने की क्षमता प्राप्त करेंगे। मेरी कृपा से प्रजा की रचना करते समय वे मोहित नहीं होंगे। 54॥
 
‘They will attain the talent to create the world through intense penance. They will not be tempted while creating people by my grace. 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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