श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 22-24
 
 
श्लोक  3.187.22-24 
स तत्र ववृधे मत्स्य: किंचित्कालमरिंदम।
तत: पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत्॥ २२॥
गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो।
समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति॥ २३॥
उद्‍धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनु: स्वयम्।
समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करनेवाले! तब वह मछली कुछ समय तक वहीं बढ़ती रही। फिर एक दिन मनु को देखकर बोली - 'प्रभु! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गंगाजी में हिल नहीं सकती। अतः आप मुझे शीघ्र ही समुद्र में ले चलो। हे प्रभु! आप प्रसन्न होकर मुझ पर इतनी कृपा कीजिए।' कुन्तीपुत्र! तब मनु ने स्वयं उस मछली को गंगाजी के जल से निकालकर समुद्र में ले जाकर वहीं छोड़ दिया॥ 22-24॥
 
O destroyer of enemies! Then that fish kept growing there for some time. Then one day seeing Manu, it said - 'Prabhu! My body has become so big now that I cannot move in Gangaji. Therefore, please take me to the sea soon. Lord! Please be pleased and do this much kindness on me.' Kunti's son! Then Manu himself took that fish out of the water of Gangaji and took it to the sea and left it there.॥ 22-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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