श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.187.2 
मार्कण्डेय उवाच
विवस्वत: सुतो राजन् महर्षि: सुप्रतापवान्।
बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युति:॥ २॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले - हे राजन! विवस्वान (सूर्य) का एक बड़ा ही तेजस्वी पुत्र था, जो प्रजापति के समान तेजस्वी और महामुनि था॥2॥
 
Markandeyaji said – Greatest king! Vivasvan (Surya) had a very glorious son, who was as radiant and a great sage as Prajapati. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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