श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  3.187.19-20 
नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम्।
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे॥ १९॥
निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता।
वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'प्रभु! साधु बाबा! अब आप कृपा करके मुझे समुद्र की प्यारी रानी गंगाजी के पास ले चलिए। मैं वहीं रहूँगा। अथवा प्रिय भाई! आप मुझे जहाँ चाहें ले जा सकते हैं। अनघ! मुझे अपनी नकारात्मक सोच त्यागकर सदैव आपकी आज्ञा का पालन करते रहना है; क्योंकि आपके ही कारण मैं इतना विकसित और बलवान हुआ हूँ।'॥19-20॥
 
‘Lord! Sadhu Baba! Now please take me to the beloved queen of the sea, Gangaji. I will stay there. Or dear brother! You may take me wherever you deem fit. Anagh! I have to abandon my negative thinking and always remain steadfast in obeying you; because it is because of you that I have grown up so well and been strengthened.'॥ 19-20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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