श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.187.18 
विचेष्टितुुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते।
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यपुत्र! वह उस कुएँ में हिल भी नहीं सकता था। अतः मनु को देखकर उसने पुनः कहा-॥18॥
 
O son of a man! He could not even move in that well. So on seeing Manu he said again-॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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