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श्लोक 3.187.18  |
विचेष्टितुुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते।
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| हे मनुष्यपुत्र! वह उस कुएँ में हिल भी नहीं सकता था। अतः मनु को देखकर उसने पुनः कहा-॥18॥ |
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| O son of a man! He could not even move in that well. So on seeing Manu he said again-॥18॥ |
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