श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.187.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: स पाण्डवो विप्रं मार्कण्डेयमुवाच ह।
कथयस्वेति चरितं मनोर्वैवस्वतस्य च॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद पांडुनन्दन युधिष्ठिर ने मार्कण्डेयजी से कहा- 'अब हमें वैवस्वत मनु का चरित्र बताइये।' 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! After this, Pandunandan Yudhishthir said to Markandeyaji - 'Now tell us the character of Vaivaswat Manu'. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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