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mahabharat 3.186.4: मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन ! उनके इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछने पर सरस्वती देवी ने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्य को धर्मात्मा, उत्तम बुद्धि वाले तथा सुनने के लिए तत्पर देखकर उनसे यह हितकर वचन कहे - 4॥   |   mahabharat अध्याय 3.186: तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.186.4 
मार्कण्डेय उवाच
एवं पृष्टा प्रीतियुक्तेन तेन
शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमबुद्धियुक्तम्।
तार्क्ष्यं विप्रं धर्मयुक्तं हितं च
सरस्वती वाक्यमिदं बभाषे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन ! उनके इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछने पर सरस्वती देवी ने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्य को धर्मात्मा, उत्तम बुद्धि वाले तथा सुनने के लिए तत्पर देखकर उनसे यह हितकर वचन कहे - 4॥
 
Markandeyaji says- Rajan! On his loving asking like this, Saraswati Devi saw Brahmarshi Tarkshya as a religious person, possessed of good intelligence and eager to listen and said these beneficial words to him - 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)