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mahabharat 3.186.20: जो मनुष्य तपस्या से क्षीण होकर सत्य व्रत का पालन करते हैं और प्रतिदिन भक्तिपूर्वक हवन करते हैं तथा हवन से बचे हुए अन्न को खाते हैं, वे पवित्र सुगन्ध से परिपूर्ण गौओं के लोक में जाते हैं और वहाँ परम सत्य, परम पुरुष का दर्शन करते हैं॥ 20॥   |   mahabharat अध्याय 3.186: तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 186: तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.186.20 
कृशाश्च ये जुह्वति श्रद्दधाना:
सत्यव्रता हुतशिष्टाशिनश्च।
गवां लोकं प्राप्य ते पुण्यगन्धं
पश्यन्ति देवं परमं चापि सत्यम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य तपस्या से क्षीण होकर सत्य व्रत का पालन करते हैं और प्रतिदिन भक्तिपूर्वक हवन करते हैं तथा हवन से बचे हुए अन्न को खाते हैं, वे पवित्र सुगन्ध से परिपूर्ण गौओं के लोक में जाते हैं और वहाँ परम सत्य, परम पुरुष का दर्शन करते हैं॥ 20॥
 
Those who, emaciated by austerity, observe the vow of truth and perform havans with devotion every day and eat the food left over from the havans, go to the world of the cows filled with sacred fragrance and there see the Supreme Truth, the Supreme Being.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)