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mahabharat 3.183.71: उनकी इच्छाएँ, उनके संकल्प और उनका ज्ञान सब निष्फल हो गए थे। उनकी स्मरण शक्ति क्षीण हो गई थी। वे सब एक-दूसरे के लिए कष्टकारी हो गए थे, एक-दूसरे पर संदेह करने लगे थे। 71.   |   mahabharat अध्याय 3.183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  3.183.71 
मोघेष्टा मोघसंकल्पा मोघज्ञाना विचेतस:।
सर्वाभिशङ्किनश्चैव संवृत्ता: क्लेशदायिन:॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
उनकी इच्छाएँ, उनके संकल्प और उनका ज्ञान सब निष्फल हो गए थे। उनकी स्मरण शक्ति क्षीण हो गई थी। वे सब एक-दूसरे के लिए कष्टकारी हो गए थे, एक-दूसरे पर संदेह करने लगे थे। 71.
 
Their wishes, their resolutions and their knowledge were all fruitless. Their memory power had weakened. They all became troublesome to each other, suspecting each other. 71.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)