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mahabharat 3.183.37: भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना मत बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया था। यह जानकर महात्मा धर्मराज ने भगवान् केशव की बहुत स्तुति की और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखकर कहा -॥37॥   |   mahabharat अध्याय 3.183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.183.37 
ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा
यथावदुक्तं पुरुषोत्तमेन।
प्रशस्य विप्रेक्ष्य च धर्मराज:
कृताञ्जलि: केशवमित्युवाच॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना मत बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया था। यह जानकर महात्मा धर्मराज ने भगवान् केशव की बहुत स्तुति की और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखकर कहा -॥37॥
 
The Supreme Personality of Godhead Sri Krishna had expressed His opinion very well. Knowing this, the great soul Dharmaraj praised Lord Keshav profusely and looking at Him with folded hands said -॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)