युधिष्ठिरो धर्मराज: शापात् त्वां मोक्षयिष्यति।
अभिमानस्य घोरस्य पापस्य च नराधिप॥ ४०॥
फले क्षीणे महाराज फलं पुण्यमवाप्स्यसि।
ततो मे विस्मयो जातस्तद् दृष्ट्वा तपसो बलम्॥ ४१॥
अनुवाद
‘राजन्! धर्मराज युधिष्ठिर आपको इस शाप से मुक्त करेंगे। महाराज! जब आपके अभिमान और घोर पाप का फल क्षीण हो जाएगा, तब आपको पुनः अपने पुण्यों का फल प्राप्त होगा।’ उस समय उनकी तपस्या का महान् बल देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।।40-41।।
‘King! Dharmaraja Yudhishthira will free you from this curse. Maharaj! When the result of your pride and grave sins will diminish, then you will again get the fruits of your good deeds.’ At that time I was very surprised to see the great power of his penance. 40-41.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥