Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.177.20-21: अब पांडवों के वनवास का बारहवाँ वर्ष आ पहुँचा था। वे उस वर्ष को वन में सुखपूर्वक व्यतीत करने के लिए अत्यन्त उत्साहित थे। अपनी अद्भुत प्रभा से चमकते हुए तपस्वी पांडव उस चैत्ररथ वन के समान सुन्दर दिखने वाले वन को छोड़कर मरुभूमि के निकट सरस्वती के तट पर चले गए और वहाँ निवास करने की इच्छा से वे द्वैत वन के द्वैत सरोवर के निकट जा पहुँचे। उस समय पांडवों का विशेष प्रेम सदैव धनुर्वेद की ओर लगा रहता था। | mahabharat अध्याय 3.177: पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ते द्वादशं वर्षमुपोपयातं
वने विहर्तुं कुरव: प्रतीता:।
तस्माद् वनाच्चैत्ररथप्रकाशात्
श्रिया ज्वलन्तस्तपसा च युक्ता:॥ २०॥
ततश्च यात्वा मरुधन्वपार्श्वं
सदा धनुर्वेदरतिप्रधाना:।
सरस्वतीमेत्य निवासकामा:
सरस्ततो द्वैतवनं प्रतीयु:॥ २१॥
अनुवाद
अब पांडवों के वनवास का बारहवाँ वर्ष आ पहुँचा था। वे उस वर्ष को वन में सुखपूर्वक व्यतीत करने के लिए अत्यन्त उत्साहित थे। अपनी अद्भुत प्रभा से चमकते हुए तपस्वी पांडव उस चैत्ररथ वन के समान सुन्दर दिखने वाले वन को छोड़कर मरुभूमि के निकट सरस्वती के तट पर चले गए और वहाँ निवास करने की इच्छा से वे द्वैत वन के द्वैत सरोवर के निकट जा पहुँचे। उस समय पांडवों का विशेष प्रेम सदैव धनुर्वेद की ओर लगा रहता था।
Now the twelfth year of the Pandavas' exile had arrived. They were very excited to spend that year happily in the forest. Shining with their wonderful radiance, the ascetic Pandavas left that forest which looked as beautiful as the Chaitrarath forest and went to the banks of the Saraswati near the desert and with the desire to live there, they went near the Dwaita lake of Dwaita forest. At that time, the special love of the Pandavas was always directed towards the Dhanur Veda.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥