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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 175: नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.175.20 
अधिष्ठाने न वाऽनार्त: प्रयुञ्जीत कदाचन।
प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन॥ २०॥
 
 
अनुवाद
यदि लक्ष्य सिद्ध भी हो जाए, तो भी जो व्यक्ति स्वयं संकट में न हो, उसे इनका प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। हे कुरुपुत्र! इन दिव्यास्त्रों का अनुचित प्रयोग करने से महापाप होता है।
 
Even if a target is achieved, a person who is not himself in trouble should never use them. O son of Kuru! Using these divine weapons inappropriately leads to a great sin.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)