श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 171: दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.171.30 
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके।
नापश्यं सहसा सर्वान् दानवान् माययाऽऽवृतान्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वह युद्ध निवातकवचों के लिए विनाशकारी था। युद्ध अभी चल ही रहा था कि अचानक सभी राक्षस अंतर्लोक के भ्रम में छिप गए। इसलिए मैं किसी को देख नहीं सका।
 
That war was disastrous for the Nivatakavachas. While the war was still going on, suddenly all the demons hid themselves in the illusion of the inner world. So I could not see anyone.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि मायायुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें मायायुद्धविषयक

एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७१॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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