श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.168.50 
पुष्करिण्यश्च विविधा: पद्मसौगन्धिकायुता:।
शीतस्तत्र ववौ वायु: सुगन्धी जीवन: शुचि:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ हजारों सुगन्धित कमलों से सुशोभित नाना प्रकार के सरोवर शोभायमान होते हैं और शीतल, शुद्ध, सुगन्धित एवं स्फूर्तिदायक वायु सदैव बहती रहती है ॥50॥
 
There, various types of lakes decorated with thousands of fragrant lotuses look beautiful and the cool, pure, fragrant and rejuvenating air keeps blowing all the time. ॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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