vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन
»
श्लोक 47
श्लोक
3.168.47
न बाधते तत्र रजस्तत्रास्ति न जरा नृप।
न तत्र शोको दैन्यं वा दौर्बल्यं चोपलक्ष्यते॥ ४७॥
अनुवाद
नरेश्वर ! वहाँ हमें मासिक धर्म के विकार नहीं सताते, बुढ़ापा नहीं आता; वहाँ दुःख, दीनता और दुर्बलता का दर्शन नहीं होता ॥47॥
Nareshwar! There, menstrual disorders do not bother us, old age does not come; There is no sight of sorrow, humility and weakness. 47॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas