श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.168.47 
न बाधते तत्र रजस्तत्रास्ति न जरा नृप।
न तत्र शोको दैन्यं वा दौर्बल्यं चोपलक्ष्यते॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर ! वहाँ हमें मासिक धर्म के विकार नहीं सताते, बुढ़ापा नहीं आता; वहाँ दुःख, दीनता और दुर्बलता का दर्शन नहीं होता ॥47॥
 
Nareshwar! There, menstrual disorders do not bother us, old age does not come; There is no sight of sorrow, humility and weakness. 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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