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श्लोक 3.168.41-42  |
अतिशक्रमिदं सर्वं तवेति प्रतिभाति मे।
इत्युक्त्वाऽऽकाशमाविश्य मातलिर्विबुधालयान्॥ ४१॥
दर्शयामास मे राजन् विमानानि च भारत।
स रथो हरिभिर्युक्तो ह्यूर्ध्वमाचक्रमे तत:॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| 'कुरुश्रेष्ठ! आपके सभी वचन मुझे इन्द्र के वचनों से भी श्रेष्ठ प्रतीत होते हैं।' हे भरतराज! ऐसा कहकर मातलि ने अंतरिक्ष लोक में प्रवेश किया और मुझे देवताओं के भवन तथा विमान दिखाए। फिर हरे घोड़ों से जुता हुआ वह रथ वहाँ से भी ऊपर की ओर चला। |
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| 'Best of the Kurus! All your words seem to me to be greater than even those of Indra.' O King of the Bharata clan! Saying so, Matali entered the space world and showed me the houses and aircrafts of the gods. Then that chariot drawn by green horses moved upwards from there as well. 41-42. |
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