श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  3.168.38-39h 
अत्यद्‍भुतमिदं त्वद्य विचित्रं प्रतिभाति मे॥ ३८॥
यदास्थितो रथं दिव्यं पदान्न चलित: पदम्।
 
 
अनुवाद
'भारत श्रेष्ठ! आज मैं एक बड़ी विचित्र और अद्भुत बात देख रहा हूँ कि इस दिव्य रथ पर बैठे हुए भी आप अपने स्थान से तनिक भी नहीं हिल रहे हैं।' 38 1/2
 
'Bhaarat's best! Today I see a very strange and wonderful thing that sitting on this divine chariot you are not moving even a little from your place. 38 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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