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mahabharat 3.167.54-55h: इस प्रकार भगवान वृषभध्वज के प्रसन्न होने पर मूर्तिरूपी दिव्य पाशुपतास्त्र, जो समस्त अस्त्रों का नाश करने वाला था और कहीं भी कभी विफल नहीं होता था, मेरे पास आकर खड़ा हो गया॥54 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 54-55h
 
 
श्लोक  3.167.54-55h 
तदप्रतिहतं दिव्यं सर्वास्त्रप्रतिषेधनम्॥ ५४॥
मूर्तिमन्मे स्थितं पार्श्वे प्रसन्ने गोवृषध्वजे।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार भगवान वृषभध्वज के प्रसन्न होने पर मूर्तिरूपी दिव्य पाशुपतास्त्र, जो समस्त अस्त्रों का नाश करने वाला था और कहीं भी कभी विफल नहीं होता था, मेरे पास आकर खड़ा हो गया॥54 1/2॥
 
In this way, when Lord Vrishabhadhwaj was pleased, the divine Pashupatastra, in the form of an idol, who was the destroyer of all weapons and never got frustrated anywhere, came and stood near me. 54 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)