श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  3.167.5-6 
यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान् वा पिनाकधृक्।
यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्च ते॥ ५॥
यथोक्तवांस्त्वां भगवान् शतक्रतुररिंदम।
कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते किं प्रियं कृतम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'शत्रुदमन! तुमने किस प्रकार देवराज इन्द्र को देखा है अथवा पिनाक धारण किए हुए भगवान शिव को देखा है, किस प्रकार तुमने समस्त अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा ली है तथा किस प्रकार देवताओं का पूजन किया है, यह सब मुझे बताओ। भगवान इन्द्र ने अभी कहा था कि 'अर्जुन ने मेरा सबसे प्रिय कार्य पूर्ण कर लिया है', अतः उनका वह कौन-सा प्रिय कार्य था, जो तुमने पूर्ण कर लिया है?॥5-6॥
 
'Shatrudaman! How you have seen Devraj Indra or how you have seen Lord Shiva holding Pinaka, how you have learnt all the weapons and how you have accomplished the task of worshipping the gods, tell me all about it. Lord Indra had just said that 'Arjuna has accomplished my most favourite task', so which was that favourite task of his which you have accomplished?॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)