Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.167.42-43: राजन! वास्तव में वे भगवान शंकर थे। उपर्युक्त आचरण करके उन्होंने दूसरा रूप धारण कर लिया। देवताओं के स्वामी भगवान महेश्वर ने किरात रूप त्यागकर दिव्य रूप धारण किया और असाधारण एवं अद्भुत वस्त्र धारण करके वहाँ खड़े हो गए।   |   mahabharat अध्याय 3.167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  3.167.42-43 
एवं कृत्वा स भगवांस्ततोऽन्यद् रूपमास्थित:।
दिव्यमेव महाराज वसानोऽद्‍भुतमम्बरम्॥ ४२॥
हित्वा किरातरूपं च भगवांस्त्रिदशेश्वर:।
स्वरूपं दिव्यमास्थाय तस्थौ तत्र महेश्वर:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
राजन! वास्तव में वे भगवान शंकर थे। उपर्युक्त आचरण करके उन्होंने दूसरा रूप धारण कर लिया। देवताओं के स्वामी भगवान महेश्वर ने किरात रूप त्यागकर दिव्य रूप धारण किया और असाधारण एवं अद्भुत वस्त्र धारण करके वहाँ खड़े हो गए।
 
King! In reality he was Lord Shankar. After behaving as mentioned above he assumed another form. Lord Maheshwar, the lord of the gods, leaving the Kirat form assumed a divine form and stood there wearing extraordinary and wonderful clothes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)