श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.167.14 
ततो मामब्रवीत् प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत।
तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्यसे विबुधाधिपम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कहा - 'भारत! तुम तपस्या की शरण में जाओ! तपस्या करने से तुम्हें शीघ्र ही इन्द्रदेव का दर्शन होगा।'
 
After that he said happily – 'India! You take refuge in penance! By practicing penance, you will soon see Lord Indra. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)