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mahabharat 3.167.1: वैशम्पायन जी कहते हैं: जनमेजय! देवराज इन्द्र के चले जाने पर अर्जुन ने अपने भाइयों और द्रौपदी सहित उनके पुत्र युधिष्ठिर को प्रणाम किया।   |   mahabharat अध्याय 3.167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.167.1 
वैशम्पायन उवाच
यथागतं गते शक्रे भ्रातृभि: सह सङ्गत:।
कृष्णया चैव बीभत्सुर्धर्मपुत्रमपूजयत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी कहते हैं: जनमेजय! देवराज इन्द्र के चले जाने पर अर्जुन ने अपने भाइयों और द्रौपदी सहित उनके पुत्र युधिष्ठिर को प्रणाम किया।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! After the departure of Devraja Indra, Arjuna along with his brothers and Draupadi bowed down to his son Yudhishthira.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)