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mahabharat 3.166.3: हे भारत! रथ के पहियों की घरघराहट, घंटियों की ध्वनि तथा सर्प, मृग और पक्षियों का शोर सब ओर से अलग-अलग सुनाई दे रहा था।   |   mahabharat अध्याय 3.166: इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 166: इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.166.3 
रथनेमिस्वनश्चैव घण्टाशब्दश्च भारत।
पृथग् व्यालमृगाणां च पक्षिणामिव सर्वश:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! रथ के पहियों की घरघराहट, घंटियों की ध्वनि तथा सर्प, मृग और पक्षियों का शोर सब ओर से अलग-अलग सुनाई दे रहा था।
 
Bharat! The whirring of the chariot's wheels, the sound of bells and the noise of snakes, deer and birds were heard separately from all sides. 3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)