श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 166: इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.166.14 
अस्त्राणि लब्धानि च पाण्डवेन
सर्वाणि मत्त: प्रयतेन राजन्।
कृतप्रियश्चास्मि धनंजयेन
जेतुं न शक्यस्त्रिभिरेष लोकै:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! पाण्डुपुत्र अर्जुन ने एकाग्रचित्त होकर मुझसे समस्त दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिए हैं। साथ ही, उसने मेरा सबसे प्रिय कार्य भी संपन्न कर लिया है। तीनों लोकों के समस्त प्राणी उसे युद्ध में परास्त नहीं कर सकते।॥14॥
 
‘O King! Arjuna, son of Pandu, has concentrated his mind and obtained all the divine weapons from me. Along with that, he has accomplished my most favourite task. All the creatures of the three worlds cannot defeat him in battle.’॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)