श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  3.163.6-7 
एतदाहुर्महेन्द्रस्य राज्ञो वैश्रवणस्य च।
ऋषय: सर्वधर्मज्ञा: सद्म तात मनीषिण:॥ ६॥
अतश्चोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजा:।
ऋषयश्चापि धर्मज्ञा: सिद्धा: साध्याश्च देवता:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'तात! सभी धर्मों के ज्ञाता महर्षि इस दिशा को देवराज इन्द्र और कुबेर का निवास स्थान बताते हैं। सभी लोग, धार्मिक ऋषि, सिद्ध महात्मा और साध्य देवता यहीं से उदय होने वाले सूर्यदेव की पूजा करते हैं।' 6-7॥
 
‘Tat! Maharshi, a sage knowledgeable about all religions, calls this direction the abode of Devraj Indra and Kubera. All the people, religious sages, accomplished Mahatmas and Sadhya gods worship the Sun God who rises from here. 6-7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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