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श्लोक 3.163.41-42  |
संतता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव।
आदायैव तु भूतानां तेजो विसृजते पुन:॥ ४१॥
विभजन् सर्वभूतानामायु: कर्म च भारत।
अहोरात्रं कला: काष्ठा: सृजत्येष सदा विभु:॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर! यह सूर्यदेव की निरन्तर गति है। सूर्यदेव एक क्षण के लिए भी नहीं रुकते। वे समस्त तत्त्वों के रसमय प्रकाश को अपने में समाहित कर लेते हैं और फिर वर्षा ऋतु में उसे पुनः बरसा देते हैं। भरत! ये भगवान सविता समस्त तत्त्वों की आयु और कार्य को विभाजित करके निरन्तर दिन-रात, कला और काष्ठ आदि काल की रचना करते रहते हैं।॥41-42॥ |
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| ‘Yudhishthira! This is the continuous movement of the Sun God. The Sun never stops even for a moment. He absorbs the juicy light of all the elements and then showers it again during the rainy season. Bharata! This Lord Savita keeps on creating day and night, art and wood etc. time continuously by dividing the age and work of all the elements.’॥ 41-42॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि मेरुदर्शने त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें मेरुदर्शनविषयक एक सौ तिरसठसाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६३॥
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