श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.163.40 
एवमेष चरन् पार्थ कालचक्रमतन्द्रित:।
प्रकर्षन् सर्वभूतानि सविता परिवर्तते॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! इस प्रकार सूर्यदेव जागृत होकर समस्त प्राणियों को आकर्षित और पोषित करते हुए तथा कालचक्र को चलाते हुए विचरण करते हैं॥40॥
 
'O son of Kunti! In this manner the Sun God becomes alert and moves about, attracting and nourishing all beings and also operating the wheel of time.॥ 40॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas