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श्लोक 3.163.40  |
एवमेष चरन् पार्थ कालचक्रमतन्द्रित:।
प्रकर्षन् सर्वभूतानि सविता परिवर्तते॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| हे कुन्तीपुत्र! इस प्रकार सूर्यदेव जागृत होकर समस्त प्राणियों को आकर्षित और पोषित करते हुए तथा कालचक्र को चलाते हुए विचरण करते हैं॥40॥ |
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| 'O son of Kunti! In this manner the Sun God becomes alert and moves about, attracting and nourishing all beings and also operating the wheel of time.॥ 40॥ |
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