श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.163.39 
वृष्टिमारुतसंतापै: सुखै: स्थावरजङ्गमान्।
वर्धयन् सुमहातेजा: पुन: प्रतिनिवर्तते॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
'महान् सूर्यदेव वर्षा, वायु और ताप द्वारा समस्त सजीव और निर्जीव प्राणियों का पोषण करके अपने धाम को लौट जाते हैं।
 
‘The mighty Sun God, after nourishing all living and non-living creatures with the help of rain, wind and heat, returns to his abode.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)