श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 35-38
 
 
श्लोक  3.163.35-38 
सिसृक्षु: शिशिराण्येव दक्षिणां भजते दिशम्।
तत: सर्वाणि भूतानि कालोऽभ्यर्च्छति शैशिर:॥ ३५॥
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च तेजसा।
तेजांसि समुपादत्ते निवृत्त: स विभावसु:॥ ३६॥
तत: स्वेदक्लमौ तन्द्री ग्लानिश्च भजते नरान्।
प्राणिभि: सततं स्वप्नो ह्यभीक्ष्णं च निषेव्यते॥ ३७॥
एवमेतदनिर्देश्यं मार्गमावृत्य भानुमान्।
पुन: सृजति वर्षाणि भगवान् भावयन् प्रजा:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'शीत ऋतु उत्पन्न करने की इच्छा से सूर्यदेव दक्षिण दिशा में आश्रय लेते हैं, अतः शीत ऋतु समस्त प्राणियों को प्रभावित करने लगती है। दक्षिणायन से निवृत्त होकर सूर्यदेव स्थावर-जंगम समस्त प्राणियों का तेज हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्य स्वेद, थकावट, आलस्य और ग्लानि का अनुभव करते हैं तथा प्राणी बार-बार निद्रा का ही आश्रय लेते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्ग को आवृत करके तथा समस्त लोकों को पुष्ट करके भगवान सूर्य पुनः वर्षा उत्पन्न करते हैं। 35-38॥
 
'With the desire to create winter, Sun God takes shelter in the south direction, hence winter starts affecting all living beings. After retiring from Dakshinayan, the Sun God takes away the glory of all living beings, movable and immovable, which is the reason why human beings experience sweat, tiredness, laziness and guilt and living beings always resort to sleep again and again. In this way, by covering this space path and affirming all the people, Lord Surya again creates rain. 35-38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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