श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.163.27-28 
एनं त्वहरहर्मेरुं सूर्याचन्द्रमसौ ध्रुवम्।
प्रदक्षिणमुपावृत्य कुरुत: कुरुनन्दन॥ २७॥
ज्योतींषि चाप्यशेषेण सर्वाण्यनघ सर्वत:।
परियान्ति महाराज गिरिराजं प्रदक्षिणम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'कुरुनन्दन! सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन इस स्थिर मेरुगिरिकी परिक्रमा करते रहते हैं। पापरहित राजन्! समस्त नक्षत्र भी गिरिराज मेरु के चारों ओर सभी दिशाओं में परिक्रमा करते हैं। 27-28॥
 
'Kurunandan! The Sun and the Moon keep circling this motionless Merugiriki every day. Sinless king! All the constellations also revolve around Giriraj Meru in all directions. 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)