श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.163.26 
स्थानमेतन्महाभाग ध्रुवमक्षयमव्ययम्।
ईश्वरस्य सदा ह्येतत् प्रणमात्र युधिष्ठिर॥ २६॥
 
 
अनुवाद
हे महामुनि युधिष्ठिर! यह भगवान् का सनातन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील धाम है। तुम्हें यहीं से उन्हें नमस्कार करना चाहिए॥ 26॥
 
'O great Yudhishthira! This is the eternal, indestructible and unchanging abode of the Supreme Lord. You should bow to Him from here.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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