श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.163.10-11 
यं प्राप्य सविता राजन् सत्येन प्रतितिष्ठति।
अस्तं पर्वतराजानमेतमाहुर्मनीषिण:॥ १०॥
एतं पर्वतराजानं समुद्रं च महोदधिम्।
आवसन् वरुणो राजा भूतानि परिरक्षति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'राजन्! जहाँ भगवान सूर्य सत्य के साथ स्थित हैं, उस पर्वतराज को बुद्धिमान पुरुष अस्ताचल कहते हैं। गिरिराज अस्ताचल और महान जलराशियों से परिपूर्ण समुद्र में रहकर राजा वरुण समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं। 10-11॥
 
'King! The place where Lord Surya is established with truth, that mountain king is called by wise men Astachal. King Varuna protects all living beings by living in the sea filled with Giriraj Astachal and great water bodies. 10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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