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श्लोक 3.162.6  |
यस्तु केवलसंरम्भात् प्रपातं न निरीक्षते।
पापात्मा पापबुद्धिर्य: पापमेवानुवर्तते॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| जो क्रोध के वश में होकर अपना पतन नहीं देखता, वह पापयुक्त मनवाला पापी मनुष्य पाप का ही अनुसरण करता है ॥6॥ |
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| He who is under the influence of anger and does not see his own downfall, that sinful man with a sinful mind only follows sin. ॥ 6॥ |
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