Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.161.50-51: ‘यह पूर्वकाल की कथा है, जब महर्षि अगस्त्य ने किसी भूल से क्रोधित होकर मुझे शाप दे दिया था। तब आपने ही उसका निवारण किया था। पाण्डवपुत्र! मुझे पूर्वकाल से ही यह दुःख देखना पड़ा था। इसमें आपका कोई दोष नहीं है।’॥50-51॥   |   mahabharat अध्याय 3.161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  3.161.50-51 
अहं पूर्वमगस्त्येन क्रुद्धेन परमर्षिणा।
शप्तोऽपराधे कस्मिंश्चित् तस्यैषा निष्कृति: कृता॥ ५०॥
दृष्टो हि मम संक्लेश: पुरा पाण्डवनन्दन।
न तवात्रापराधोऽस्ति कथंचिदपि पाण्डव॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
‘यह पूर्वकाल की कथा है, जब महर्षि अगस्त्य ने किसी भूल से क्रोधित होकर मुझे शाप दे दिया था। तब आपने ही उसका निवारण किया था। पाण्डवपुत्र! मुझे पूर्वकाल से ही यह दुःख देखना पड़ा था। इसमें आपका कोई दोष नहीं है।’॥50-51॥
 
‘It is a story of the past, when Maharishi Agastya was angry at some mistake and cursed me. It was you who got rid of it. Son of Pandavas! I was destined to see this sorrow from the past. You are not at fault in any way in this.’॥ 50-51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)