Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.161.12: पार्थ! जो मनुष्य धन और धर्म का अनादर करता है तथा पापकर्म में लिप्त रहता है, उसे अपने पापकर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। यदि तुम मुझे प्रसन्न करने वाला कार्य करना चाहते हो, तो आज के बाद ऐसा कार्य फिर कभी न करना॥12॥ | mahabharat अध्याय 3.161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अर्थधर्मावनादृत्य य: पापे कुरुते मन:।
कर्मणां पार्थ पापानां स फलं विन्दते ध्रुवम्।
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ १२॥
अनुवाद
पार्थ! जो मनुष्य धन और धर्म का अनादर करता है तथा पापकर्म में लिप्त रहता है, उसे अपने पापकर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। यदि तुम मुझे प्रसन्न करने वाला कार्य करना चाहते हो, तो आज के बाद ऐसा कार्य फिर कभी न करना॥12॥
Partha! One who disrespects wealth and religion and indulges in sins will surely reap the fruits of his sinful deeds. If you want to do the work that pleases me, then you should never do such a thing again from today onwards.॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥