श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.157.41 
आस्था तु त्वयि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा।
ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रियम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
‘मेरा तुम पर से विश्वास उठ गया था, फिर भी तुमने ब्राह्मण वेश में अपना असली रूप छिपाकर रखा और हमसे कोई अप्रिय बात नहीं कही। इसीलिए मैंने तुम्हें तत्काल नहीं मारा॥ 41॥
 
‘I had lost faith in you, yet you kept your true identity hidden in the form of a Brahmin and did not say anything unpleasant to us. That is why I did not kill you immediately.॥ 41॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas