श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.157.23 
भुक्त्वा चान्नानि दुष्प्रज्ञ कथमस्मान् जिहीर्षसि।
एवमेव वृथाचारो वृथावृद्धो वृथामति:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
हे विकृत बुद्धि वाले राक्षस! तू हमारा अन्न खाकर हमें कैसे ले जाना चाहता है? अब तक तूने जो भी ब्राह्मण होकर आचरण किया है, वह सब व्यर्थ है। तेरा बढ़ना और बुढ़ापा भी व्यर्थ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है॥ 23॥
 
‘You demon with a wrong intellect! How can you wish to take us away by eating our food? All the behaviour you have displayed as a Brahmin till now was futile. Your growth or your aging is also futile. Your intellect is also futile.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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