श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.157.17 
समृद्धॺा ह्यस्य लोकस्य लोको युष्माकमृध्यति।
इमं च लोकं शोचन्तमनुशोचन्ति देवता:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'इस मनुष्य लोक की समृद्धि से ही तुम सबका लोक समृद्ध होता है। यदि इस लोक की दशा शोचनीय हो तो देवता भी शोक में पड़ जाते हैं। 17॥
 
'It is only because of the prosperity of this human world that the world of all of you becomes prosperous. If the condition of this world is deplorable then even the gods fall into mourning. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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