श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 156: पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुन: नर-नारायणाश्रममें लौटना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.156.6 
अर्चिता: सततं देवा: पुष्पैरद्भि: सदा च व:।
यथालब्धैर्मूलफलै: पितरश्चापि तर्पिता:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
‘हमने सदैव पुष्प और जल से देवताओं की पूजा की है तथा जो भी फल और मूल मिले हैं, उनसे अपने पितरों को भी तृप्त किया है।॥6॥
 
‘We have always worshipped the gods with flowers and water and have also satisfied our ancestors with whatever fruits and roots we got.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)