vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 156: पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुन: नर-नारायणाश्रममें लौटना
»
श्लोक 6
श्लोक
3.156.6
अर्चिता: सततं देवा: पुष्पैरद्भि: सदा च व:।
यथालब्धैर्मूलफलै: पितरश्चापि तर्पिता:॥ ६॥
अनुवाद
‘हमने सदैव पुष्प और जल से देवताओं की पूजा की है तथा जो भी फल और मूल मिले हैं, उनसे अपने पितरों को भी तृप्त किया है।॥6॥
‘We have always worshipped the gods with flowers and water and have also satisfied our ancestors with whatever fruits and roots we got.॥ 6॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×