श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 154: भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.154.9-10 
भीमसेन उवाच
राक्षसास्तं न पश्यामि धनेश्वरमिहान्तिके।
दृष्ट्वापि च महाराजं नाहं याचितुमुत्सहे॥ ९॥
न हि याचन्ति राजान एष धर्म: सनातन:।
न चाहं हातुमिच्छामि क्षात्रधर्मं कथंचन॥ १०॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन बोले— राक्षसो! एक तो मैं यहाँ आसपास कहीं भी कोषाध्यक्ष कुबेर को नहीं देख रहा हूँ, दूसरे यदि मैं उन महाराज को देख भी लूँ, तो भी उनसे भिक्षा नहीं माँग सकता, क्योंकि क्षत्रिय किसी से कुछ नहीं माँगते, यही उनका सनातन धर्म है। मैं किसी भी प्रकार क्षत्रिय-धर्म को छोड़ना नहीं चाहता।॥9-10॥
 
Bhimsen said— Demons! Firstly, I am not seeing the treasurer Kuber anywhere around here, secondly, even if I see that Maharaj, I cannot beg from him, because Kshatriyas do not ask for anything from anyone, this is their eternal religion. I do not want to leave Kshatriya-dharma in any way.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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