श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 154: भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.154.5 
देवर्षयस्तथा यक्षा देवाश्चात्र वृकोदर।
आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिबन्ति रमयन्ति च।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव विहरन्त्यत्र पाण्डव॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वृकोदर! ऋषि, यक्ष और देवता भी यक्षराज कुबेर की अनुमति लेकर ही इस स्थान का जल पीते हैं और इसमें विचरण करते हैं। हे पाण्डुपुत्र! गन्धर्व और अप्सराएँ भी इसी नियम से यहाँ विचरण करती हैं॥5॥
 
Vrikodara! Even sages, yakshas and gods drink the water of this place and roam around in it only after taking permission from king of yakshas Kubera. O son of Pandu! Gandharvas and Apsaras also roam around here according to this rule.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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