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श्लोक 3.154.27  |
ततोऽभ्यनुज्ञाप्य धनेश्वरं ते
जग्मु: कुरूणां प्रवरं विरोषा:।
भीमं च तस्यां ददृशुर्नलिन्यां
यथोपजोषं विहरन्तमेकम्॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| तब कोषाध्यक्ष की अनुमति लेकर वे राक्षस बिना किसी क्रोध के कुरुनायक भीमसेन के पास गए और उनकी इच्छानुसार उन्हें अकेले ही सरोवर में क्रीड़ा करते हुए देखा॥ 27॥ |
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| Then, taking the treasurer's permission, those demons, without any anger, went to the Kuru leader Bhima and saw him alone playing in the lake as per his wish.॥ 27॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५४॥
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