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श्लोक 3.150.9  |
एतावदिह शक्तस्त्वं द्रष्टुं रूपं ममानघ।
वर्धेऽहं चाप्यतो भूयो यावन्मे मनसि स्थितम्।
भीमशत्रुषु चात्यर्थं वर्धते मूर्तिरोजसा॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| 'अनघ! तुम यहाँ मेरा इतना ही बड़ा रूप देख सकते हो, परन्तु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूँ। तुम मेरे मन में जितना बड़ा रूप कल्पना करोगे, मैं उतना ही बड़ा हो सकता हूँ। भयंकर शत्रुओं के समीप मेरा रूप बड़े वेग से बढ़ता है।'॥9॥ |
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| 'Anagh! You can see my form here only this big, but I can become even bigger than this. The bigger the form you imagine in my mind, the more I can grow. My form grows with great vigour near the dreadful enemies.'॥9॥ |
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